Monday, 29 September 2014


मौड़- दर-मौड़,लक्ष्य हर पाने मेँ, जाने कहाँ खो गयी जिँदगी,,
खुदा ने बनाये इसाँन, लेकीन जँमीँ पर मशीन हो गयी जिँदगी,
स्वार्थ को दिमाग मेँ पाले ये प्राण, कहाँ अपना जमीर खो गये,
दौड रहे सब कुछ पाने को, अपना अस्तित्व लेकीन भुल गये।।

सुख के भेष मेँ ये कँकरीट के जगंल, ये डामर के बिहड,
अस्तित्व से जुड़े वो प्रकृति संग रिश्ते, अब होते पत्थर कँकंड..
फर्राती कारोँ मेँ ये रफ्तार भरी जिँदगी, अब पहले सी क्योँ नहीँ,
गगनचुँबी इमारतोँ मेँ हर पल घुटती जिदँगीँ, अब पहले सी क्योँ नहीँ।।

आधुनिकता की दौड़ मेँ पल पल मरते ये रीति रिवाज,
पाश्चात्यता की नकली रोशनी मेँ चमकता ये समाज..
social media के फेरोँ मेँ सगोँ से दूर ये जिँदगीँ,
हजारोँ अजनबी यारोँ के बीच मेँ भी अकेली ये जिँदगी।।
दिल से जुडे सम्बन्धोँ का स्वार्थ के तराजू मेँ हिसाब,
अपनी जमीँ छोड़-भुलकर, तारेँ तोड़ने के ख्वाब..
गली के खेल खिलोने छोड़ T.V. computer संग जिँदगी,
perfaction की खोज मेँ बचपन को खोती ये जिँदगी ।।

अर्जुन के देश मेँ अपने लक्ष्य से भटकती जवानी,
कृष्ण के देश मेँ फिर चीर-हरण दिखलाती ये मर्दानी,
मन की पवित्रता को शक्ल के आईने मेँ खोजती जिँदगी, अब पहले सी क्योँ नहीँ ।।
अपनी खुशी सबसे ऊपर मान, औरो को जख्म देती जिँदगी, अब पहले सी क्योँ नहीँ।।


Friday, 18 April 2014

ए खुदा कुछ तो जरा करम कर दे,
इस बंदे पर कुछ तो जरा रहम कर दे।।
दुख तो बहुत है इसके दिल मेँ,
तु बस कुछ यादेँ भुला दे, खुशियोँ मेँ बरकत कर दे ।।

Wednesday, 1 January 2014

नये साल की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। भगवान हमेँ हमारेँ भीतर समाई सभी नकारात्मकताओँ तथा द्वेषोँ से लड़ने तथा उन्हेँ पीछे छोड़ने की आंतरिक शक्ति प्रदान करे। इसी आशा के साथ 2013 की बुरी यादोँ को पीछे छोड़कर तथा अच्छी यादो का हाथ थाम कर आइये स्वागत करे इस नये साल का।

Wednesday, 25 December 2013

ये कैसी विडम्बना...

माँ तेरी प्यारी बेटी,तेरी आँखोँ की दुलारी..
आज है लाचार,इन हालातोँ की मारी....
तेरे आँचल के छाँव मेँ, जो नाजोँ से थी पली बढी..
आज है उलझन मेँ, इस दुनिया मेँ अकेली खडी..

हर लम्हा खुश होने का,जो सपना तुमनेँ दिखाया था...
हाथ फेरकर सिर पर प्यार का,जब डोली मेँ तुमने बेठाया था...
कहाँ था उस समय तुने, उस घर को हर सुख देना...
हो रही है तु इस घर से विदा, अब उस माँ को ही तु अपना कहना...

फिर ये मेरी दूसरी माँ क्योँ आज ये कहती है,
तेरी कोख मेँ वंश का अंश नहीँ, एक मनहूस सी बेटी है।।।

मेरा वो परमेश्वर पति जो पलकोँ पर मुझे रखता था,,,
जीवन मेँ हर खुशी के, ख्वाब जो दिल मेँ भरता था ।।।
वो अक्स जिनके ख्वाबोँ मेँ जिँदगी समाई रहती थी,,
जिन नजरोँ के लिये हर पल मेँ सजी हुई रहती थी....

फिर क्योँ मेरे इस अजन्मेँ टुकडेँ के लिये,मैँ उन नजरोँ मेँ घिर गयी,,
क्योँ आज माँ तेरी प्यारी बेटी, इस घर से भी विदा हो गयी...

तु तो कहती थी माँ कि तेरा मेरा रिश्ता है सबसे बडा....
माँ रखती है 9 माह कोख मेँ,करती है अपने आँगन मेँ बडा.
ताकि वो किसी और का आँगन महका सके,
किसी और के घर का वंश, वो आगे बढ़ा सके.

फिर क्योँ ये समाज सोचता है, कि बेटियाँ घर पर बोझ बढ़ाती है...
फिर क्योँ ये समाज कहता है , कि वंश तो बेटा ही बढाता है...

देती हूँ अब तो ये दुआ इन्हेँ,,
इनके घर भी अब एक नन्हाँ फूल ही खिले...
पाल पोस कर बढा करे उसे लेकीन,,
वंश बढ़ाने को कोई लड़की ना मिले....

सोचती हूँ कि अब इस दुनिया मेँ बस अकेले ही आगे बंढु,,
लड़कर इस समाज से बेटी को दिलो जान से बड़ा करू...
ताकि पढ लिखकर वो मजबुत बन सके,,,
इस जहाँ मेँ आगे बढ़कर वो इस बुराई से लड सके...

बस दुआ चाहिये तुम्हारी,, आर्शीवाद हर पल संग हो..
दे शक्ति दुर्गा मुझे,, मन मेँ अब कोई डर ना हो....

Sunday, 24 November 2013

yaadin kuch ankahi si....




बागीचे की वो कुर्सी जो दिखती है तन्हा अभी,, 
 रखी है कब से उस सागर किनारे बरगद की गोद में.…

नहीं है लेकिन अकेली वो,,उसके हर अंश संग,  
हमारी गुजरी बातों की यादें है उसके जहन में. . .

उस पुराने वृक्ष के बिखरे सूखे पत्तो संग,,  
 जिंदगी के लम्हें खो गए है आज कहीं….
यादों की ये सुहानी पवन इन पत्तों संग,,
ले ना जाए उड़ा कर मुझे उन लम्हों कि गोद में कहीं…. 

साँझ ढले अपने आशियाँ चले पंछियो संग,,  
बीते थे वो लम्हें,उस कृष्ण चाँद के आगाज में
यादों की इन बेइन्तहा परतों में दबे वो दिन,,  
जिन्दा है आज भी इन सहजे हुऐ पुराने ख़तो में  ....

उस अतुल सागर को छलकाने की आस में,, 
चाँदनी की ओट में वो पूरब की मेघांशी
देखी थी उस पल मैने उस सागर के तट पर,, 
तुम्हारे चहरे पर आयी एक मासुम सी खुशी… 

सुकुन के उन पलों में जो सहारा था तुम्हारा, 
उन कांधो पर तुम्हारी जुल्फ़ों का स्पर्श है आज भी
उन यादों कि एक पोटली रखी है बांध कर मैने,,
ली है उसने जगह तुम्हारी,, मेरे इस दिल में अभी…

हुई है अब ये बातें पुरानी बहुत,इस ख़ुशनसीब दिल कि किताब में,,
चुभती है अब तो शूल सी वो,,मेरी जिंदगी के इन बहतरीन पन्नो में…  

लेकीन कहाँ तक जायेगी मुझे छोड़ कर तुम्हारी धुँधली बिसरी यादें,,
जानती है अब तो वो भी,, तुम मेरी साँसों में अब तक भी जो बसी हो..