माँ तेरी प्यारी बेटी,तेरी आँखोँ की दुलारी..
आज है लाचार,इन हालातोँ की मारी....
तेरे आँचल के छाँव मेँ, जो नाजोँ से थी पली बढी..
आज है उलझन मेँ, इस दुनिया मेँ अकेली खडी..
हर लम्हा खुश होने का,जो सपना तुमनेँ दिखाया था...
हाथ फेरकर सिर पर प्यार का,जब डोली मेँ तुमने बेठाया था...
कहाँ था उस समय तुने, उस घर को हर सुख देना...
हो रही है तु इस घर से विदा, अब उस माँ को ही तु अपना कहना...
फिर ये मेरी दूसरी माँ क्योँ आज ये कहती है,
तेरी कोख मेँ वंश का अंश नहीँ, एक मनहूस सी बेटी है।।।
मेरा वो परमेश्वर पति जो पलकोँ पर मुझे रखता था,,,
जीवन मेँ हर खुशी के, ख्वाब जो दिल मेँ भरता था ।।।
वो अक्स जिनके ख्वाबोँ मेँ जिँदगी समाई रहती थी,,
जिन नजरोँ के लिये हर पल मेँ सजी हुई रहती थी....
फिर क्योँ मेरे इस अजन्मेँ टुकडेँ के लिये,मैँ उन नजरोँ मेँ घिर गयी,,
क्योँ आज माँ तेरी प्यारी बेटी, इस घर से भी विदा हो गयी...
तु तो कहती थी माँ कि तेरा मेरा रिश्ता है सबसे बडा....
माँ रखती है 9 माह कोख मेँ,करती है अपने आँगन मेँ बडा.
ताकि वो किसी और का आँगन महका सके,
किसी और के घर का वंश, वो आगे बढ़ा सके.
फिर क्योँ ये समाज सोचता है, कि बेटियाँ घर पर बोझ बढ़ाती है...
फिर क्योँ ये समाज कहता है , कि वंश तो बेटा ही बढाता है...
देती हूँ अब तो ये दुआ इन्हेँ,,
इनके घर भी अब एक नन्हाँ फूल ही खिले...
पाल पोस कर बढा करे उसे लेकीन,,
वंश बढ़ाने को कोई लड़की ना मिले....
सोचती हूँ कि अब इस दुनिया मेँ बस अकेले ही आगे बंढु,,
लड़कर इस समाज से बेटी को दिलो जान से बड़ा करू...
ताकि पढ लिखकर वो मजबुत बन सके,,,
इस जहाँ मेँ आगे बढ़कर वो इस बुराई से लड सके...
बस दुआ चाहिये तुम्हारी,, आर्शीवाद हर पल संग हो..
दे शक्ति दुर्गा मुझे,, मन मेँ अब कोई डर ना हो....
आज है लाचार,इन हालातोँ की मारी....
तेरे आँचल के छाँव मेँ, जो नाजोँ से थी पली बढी..
आज है उलझन मेँ, इस दुनिया मेँ अकेली खडी..
हर लम्हा खुश होने का,जो सपना तुमनेँ दिखाया था...
हाथ फेरकर सिर पर प्यार का,जब डोली मेँ तुमने बेठाया था...
कहाँ था उस समय तुने, उस घर को हर सुख देना...
हो रही है तु इस घर से विदा, अब उस माँ को ही तु अपना कहना...
फिर ये मेरी दूसरी माँ क्योँ आज ये कहती है,
तेरी कोख मेँ वंश का अंश नहीँ, एक मनहूस सी बेटी है।।।
मेरा वो परमेश्वर पति जो पलकोँ पर मुझे रखता था,,,
जीवन मेँ हर खुशी के, ख्वाब जो दिल मेँ भरता था ।।।
वो अक्स जिनके ख्वाबोँ मेँ जिँदगी समाई रहती थी,,
जिन नजरोँ के लिये हर पल मेँ सजी हुई रहती थी....
फिर क्योँ मेरे इस अजन्मेँ टुकडेँ के लिये,मैँ उन नजरोँ मेँ घिर गयी,,
क्योँ आज माँ तेरी प्यारी बेटी, इस घर से भी विदा हो गयी...
तु तो कहती थी माँ कि तेरा मेरा रिश्ता है सबसे बडा....
माँ रखती है 9 माह कोख मेँ,करती है अपने आँगन मेँ बडा.
ताकि वो किसी और का आँगन महका सके,
किसी और के घर का वंश, वो आगे बढ़ा सके.
फिर क्योँ ये समाज सोचता है, कि बेटियाँ घर पर बोझ बढ़ाती है...
फिर क्योँ ये समाज कहता है , कि वंश तो बेटा ही बढाता है...
देती हूँ अब तो ये दुआ इन्हेँ,,
इनके घर भी अब एक नन्हाँ फूल ही खिले...
पाल पोस कर बढा करे उसे लेकीन,,
वंश बढ़ाने को कोई लड़की ना मिले....
सोचती हूँ कि अब इस दुनिया मेँ बस अकेले ही आगे बंढु,,
लड़कर इस समाज से बेटी को दिलो जान से बड़ा करू...
ताकि पढ लिखकर वो मजबुत बन सके,,,
इस जहाँ मेँ आगे बढ़कर वो इस बुराई से लड सके...
बस दुआ चाहिये तुम्हारी,, आर्शीवाद हर पल संग हो..
दे शक्ति दुर्गा मुझे,, मन मेँ अब कोई डर ना हो....

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