इक जिँदगी थी वो भी,,क्या दिन थे वो भी....
वो दोस्तो के साथ घुमना फिरना,,,,
वो मस्ती के पल मिलके जीना......
चिन्ता कहीँ ना थी,थी फिक्र कोई नहीँ,,,,,
बस मैँ और मेरे दोस्त,और कोई नहीँ....
बने थे वो दोस्त दिल से,इक दूसरे की कमजोरी को भुल के.....
थे सच्चे हम,,जैसे भी थे;मिलते, झगडते,इक दूसरे को मनाते.
चाहे कैसे भी थे,बस तुम ही तो थे, और बाकी दूनिया जाने कहाँ थी.....
वो तुम्हारे साथ घुमने जाना,,
बारिश मेँ वो जम के नाचना,,,,
वो रेल की पटरियोँ पर गाने गाना,,,,
वो घंटी बजा कर फिर भाग जाना...
वो हर पल मेँ खुशियाँ मनाना....
और गम आने पर एक साथ चिल्लाना..."चल छोड भी यार, होता रहता है।....
वो f.s. के किनारे झुम के चलना .....
वो कविता बनाना और मिल के गाना....
वो Class मेँ इशारोँ मेँ बातेँ करना,,,
वो घर का टिफिन लूट कर खाना......
मिलेगे एक दिन ऐसे दोस्त फिर से,,
बनेगे एक दिन ऐसे दोस्त फिर से,,....

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