देखा था हमनेँ कभी उन्हेँ ख्यालोँ भरी शामोँ मेँ,,,
ईद के चाँद सा मुखडा लिये सुने गलियारोँ मेँ....
हमनेँ उनकी तारिफोँ मेँ महफिलोँ के समाँ बाँध दिये,,,
उनकी झुल्फोँ के फेरोँ मेँ दिल के सारे दर खोल दिये.....
कहाँ था इशारोँ मेँ हमनेँ उनसे,ज़रा आया तो कीजिये,,,
अपने हुस्न के दीदार से महफिल को जवाँ तो कीजियेँ...
वो आयी थी इक रोज़, हमारे जश्न मेँ शरीक़ होने को,,,
हमारे अल्फाज़ोँ के ज़ाम का एक पैमाना पीने को...
हम उनकी दिलकश नजरोँ मेँ अपना दिल खो बैठे,,,,
अपनी बेज़ान सी रूह को फिर एक नयी ज़ान दे बैठे....
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