Sunday, 20 October 2013

sacchi dunia


जीवन के महत्व से भी बड़ी,, सिर पर खड़ी ये परेशानियाँ....

ये जीवन की नकली खुशियाँ,, ये झुठी फरेबी किलकारियाँ...
छोटी छोटी बातोँ पर वो दिल का रूठना,,,
सच्ची दूनियाँ के आँगन मेँ सपनोँ का टुटना...
बहुत हुऐ ये नियमोँ मेँ झकड़े अहसास,ये सोच की बँधीशेँ,,,
बहुत हुई ये झुठी मुस्कान,ये अवसाद की रातेँ..... 
बहुत हुऐ ये जीने के झुठे मायने,ये चुभती बातेँ...
जीवन के इस कठोर पलंग पर चिन्ताएँ सिरहाने....


दिल तोडते इन ख्यालोँ को छोड़ अब खुलकर जीना चाहता हूँ...
इस उगते सूरज़ की रोशनी मेँ नये जहाँ को देखना चाहता हूँ...
पहली किरन सँग घर से निकले पछियोँ को देखना चाहता हूँ...
अपने दिल मेँ दबे, खुशियोँ से रोशन जहाँ के सपने को सच करना चाहता हूँ..

मैँ इन बदिशोँ भरे जहाँ को छोड़,,खुली सोच के आसमां मेँ जीना चाहता हूँ...
इन भँगुर सपनोँ भरी नीँद को तोड़ माँ की अक्षय गोद मेँ सोना चाहता हूँ....
इन झुठे फरेबी मुखोटोँ को छोड़ अपनत्व के रस को पीना चाहता हूँ....
मैँ अँकुश सागर की सीमा तोड़ बेरोक लहरोँ मेँ खोना चाहता हूँ....

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